पहले भी सामने आ चुकी हैं लापरवाही की शिकायतें
डिंडोरी: बालक आश्रम में बड़ी लापरवाही; गैस सिलेंडर खत्म होने का बहाना बना बच्चों को भेजा घर, अधीक्षक नदारद
डिंडोरी: मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले के चंद्रागढ़ स्थित बालक आश्रम से प्रबंधन की एक बेहद गंभीर और गैर-जिम्मेदाराना तस्वीर सामने आई है। यहाँ बच्चों के भविष्य और उनकी सुविधाओं के साथ खिलवाड़ करते हुए, गैस सिलेंडर की कमी का झूठा हवाला देकर सभी छात्रों को अघोषित छुट्टी पर घर भेज दिया गया। शासन की योजनाओं को पलीता लगाते हुए इस 50 सीटर आश्रम को पूरी तरह खाली कर दिया गया है।
मौके से नदारद मिले शिक्षक और अधीक्षक
जब इस मामले की जमीनी हकीकत जानने की कोशिश की गई, तो आश्रम का नजारा चौंकाने वाला था। 50 छात्रों की क्षमता वाले इस सरकारी संस्थान में न तो एक भी छात्र मौजूद था और न ही कोई शिक्षक।
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अधीक्षक की अनुपस्थिति: जानकारी के अनुसार, आश्रम की पूरी जिम्मेदारी संभालने वाले अधीक्षक देवेंद्र कुमार मौके से गायब थे।
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कर्मचारी का बयान: वहां मौजूद भृत्य मुकेश ने बताया कि अधीक्षक किसी निजी विवाह समारोह में शामिल होने गए हैं, जबकि अन्य शिक्षक संकुल कार्यालय जाने का दावा कर रहे थे। हालांकि, वास्तविकता यह थी कि पूरा परिसर वीरान पड़ा था।
सिलेंडर का बहाना और प्रशासनिक विफलता
सबसे हैरान करने वाला तथ्य यह सामने आया कि शनिवार को केवल गैस सिलेंडर खत्म होने के कारण बच्चों को उनके घर रवाना कर दिया गया।
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संसाधनों की उपलब्धता: रिकॉर्ड के अनुसार, आश्रम में तीन गैस सिलेंडर उपलब्ध कराए गए हैं। ऐसे में सिलेंडर की किल्लत की बात कहना केवल अपनी जिम्मेदारी से बचने का एक बहाना नजर आता है।
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गोलमोल जवाब: मामले की भनक लगते ही जब अधीक्षक मौके पर पहुंचे, तो उन्होंने कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण देने के बजाय जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश की और संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके।
भीषण गर्मी और सरकारी दावों की पोल
एक ओर जिला प्रशासन भीषण गर्मी और लू को देखते हुए छात्रावासों व स्कूलों के लिए कड़े दिशा-निर्देश और सुरक्षा मानक तय कर रहा है, वहीं दूसरी ओर चंद्रागढ़ बालक आश्रम की यह स्थिति जमीनी हकीकत को बयां कर रही है।
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सवालों के घेरे में प्रबंधन: क्या केवल एक सिलेंडर खत्म होने पर पूरे संस्थान को बंद करना उचित है? क्या गरीब परिवारों से आने वाले इन बच्चों के भोजन और सुरक्षा की कोई अहमियत नहीं है?
कार्रवाई का इंतजार
आश्रम से बच्चों को इस तरह बिना किसी आधिकारिक आदेश के घर भेज देना सरकारी नियमों का खुला उल्लंघन है। अब स्थानीय निवासियों और अभिभावकों की नजरें शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि इस घोर लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और शिक्षकों पर क्या दंडात्मक कार्रवाई की जाती है।
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