ऋषि मनु ने क्यों खत्म कराई पराए पुरुष से संतान पैदा करने की नियोग प्रथा, क्यों इसे कहा खराब
महाभारत काल में पराए पुरुष के जरिए संतान पैदा करने की एक धर्म सम्मत प्रथा थी,जिसको नियोग कहते थे. पांडवों और कौरवों के पिता पांडु और धृतराष्ट्र का जन्म नियोग से ही हुआ था. फिर ऐसा ही पांडवों के जन्म के साथ हुआ. लेकिन महाभारत काल के खत्म होने के बाद नियोग परंपरा खत्म होती चली गई. इसे खत्म करने का काम मुख्य तौर पर ऋषि मनु द्वारा कराया गया. जानें क्या थी उसकी वजह
महाभारत के दौर में नियोग प्रथा खूब फलीफूली. उस दौर में अगर किसी पुरुष को कोई संतान नहीं हो पाती थी या किसी महिला के पति का निधन हो चुका होता था तो वो परिजनों की अनुमति से दूसरे पुरुष से संतान पैदा कर सकती थी. हालांकि नियोग प्रथा के भी नियम थे ताकि इसमें नैतिकता और शुचिता बनी रहे. जैसे ही किसी महिला को नियोग से संतान पैदा हो जाती थी, उस पुरुष के साथ उसके नियोग रिश्ते तुरंत खत्म हो जाते थे. अब सवाल ये उठता है कि जो परंपरा महाभारत काल में खूब स्वीकार की गई, उसको बाद में क्यों रोक दिया गया. क्यों ऋषि मनु ने इसे खराब बताया.
महाभारत काल के आखिर तक समाज में नैतिकता के मानक बदलने लगे. लोग इस प्रथा का दुरुपयोग करने लगे. इससे सामाजिक व्यवस्था बिगड़ने का डर पैदा हो गया. बाद में ऋषि मनु ने इसे पूरी तरह वर्जित घोषित कर दिया. ऋषि मनु ने तो इसे ‘पशुधर्म’ कहकर इसकी आलोचना की.
ऋषि मनु का मानना था कि एक बार विवाह होने के बाद स्त्री को केवल अपने पति के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए. उन्होंने विधवाओं के लिए कठोर ब्रह्मचर्य का समर्थन किया. उन्होंने नियोग को सामाजिक तौर पर कड़ाई से हतोत्साहित किया. उनके अनुसार, यह प्रथा केवल विषम परिस्थितियों के लिए थी न कि सामान्य व्यवहार के लिए.
अब हम आपको एक बार फिर बता देते हैं कि नियोग प्रथा क्या थी? प्राचीन काल की एक ऐसी परंपरा थी जिसमें यदि कोई स्त्री निसंतान हो और उसका पति संतानोत्पत्ति में अक्षम हो या उसकी मृत्यु हो गई हो, तो वह अपने देवर या किसी प्रतिष्ठित ऋषि से केवल संतान प्राप्ति के उद्देश्य से संतान प्राप्ति के लिए संपर्क कर सकती थी.
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