2 मिनट में बनेगा सुरक्षा कवच! लहसुन, सरसों-होलिका भस्म की जादुई पोटली, जानें नजर उतारने का देसी नुस्खा
सनातन परंपरा में होली केवल रंगों का त्यौहार नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की विजय का महापर्व है. फाल्गुन पूर्णिमा की रात होने वाला होलिका दहन आध्यात्मिक शुद्धि और नकारात्मक शक्तियों के नाश का प्रतीक माना जाता है. पूर्णिया के प्रसिद्ध पंडित मनोत्पल झा के अनुसार होलिका दहन की अग्नि में न केवल बुराइयां जलती हैं. बल्कि इसकी भस्म और परंपरागत टोटकों में बच्चों को बुरी नजर से बचाने की अद्भुत शक्ति समाहित होती है. आइए जानते हैं क्या उपाय है.
भक्त प्रह्लाद की आस्था और होलिका का अंत
पौराणिक कथाओं के अनुसार जब अहंकारी हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने के लिए अपनी बहन होलिका (जिसे अग्नि से न जलने का वरदान था) की गोद में बिठाकर आग के हवाले किया. तब भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सकुशल बच गए. होलिका भस्म हो गई. पंडित जी बताते हैं कि तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि होलिका की पवित्र अग्नि से निकली भस्म सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र होती है.
बुरी नजर से बचाव के अचूक देसी उपाय
पंडित मनोत्पल झा कहते हैं कि आज के आधुनिक दौर में भी ग्रामीण और शहरी इलाकों में लोग सदियों पुराने इन उपायों पर अटूट विश्वास रखते हैं. छोटे बच्चों को नजर और नकारात्मक ऊर्जा से बचाने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाई जाती है.
पवित्र भस्म का टीका. होलिका दहन के अगले दिन सुबह लोग अग्नि के अवशेष यानी भस्म को घर लाते हैं. इसे मंदिर में देवताओं को अर्पित करने के बाद बच्चों और बड़ों के माथे पर लगाया जाता है. मान्यता है कि यह भस्म मानसिक शांति और सुरक्षा प्रदान करती है.
सुरक्षा पोटली. होलिका दहन की रात कई लोग गेहूं की बालियां, लहसुन की कलियां और पीली सरसों जैसी सामग्रियों को जलती आग में हल्का पकाते हैं. इन अधपकी सामग्रियों के अवशेषों को एक साथ मिलाकर एक विशेष पोटली बनाई जाती है.
नेगेटिव ऊर्जा का नाश. इन सामग्रियों से तैयार ताबीज या पोटली को बच्चों के गले में पहनाया जाता है. माना जाता है कि ऐसा करने से बच्चों के आसपास कोई भी बुरी शक्ति नहीं भटकती और वे बीमारियों व नजर दोष से सुरक्षित रहते हैं.
वैज्ञानिक और सामाजिक नजरिया
धार्मिक आस्था के साथ-साथ यह परंपरा सामाजिक एकता का भी संदेश देती है. होलिका दहन में अनाज (जैसे गेहूं और चना) को अग्नि को समर्पित करना आने वाली नई फसल की खुशी और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का तरीका भी है. पूर्णिया और आस-पास के क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में लोग इन उपायों को पूरी श्रद्धा के साथ अपनाते हैं.
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